बीएलओ शिक्षकों को ओबीसी जनगणना से छात्रहित में मुक्त रखा जाये-गहलोत

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शिवगंज- बीएलओ शिक्षको को ओबीसी जनगणना में लगाने पर संगठन ने कड़ा एतराज जताते हुए राज्य के मुख्य सचिव,अतिरिक्त मुख्य सचिव(स्कूल शिक्षा) को ज्ञापन भेजकर ओबीसी जनगणना सर्वे में लगे बीएलओ शिक्षको व शिक्षको को पूर्णतया मुक्त रखने की राजस्थान शिक्षक संघ(प्रगतिशील) के प्रदेश मुख्य महामंत्री धर्मेन्द्र गहलोत ने पुरजोर शब्दों में माँग की है।

संघ(प्रतगतिशील) के प्रदेश मुख्य महामंत्री धर्मेन्द्र गहलोत ने ज्ञापन देकर बताया है कि प्रशासन देख रहा है लेकिन ओबीसी जनगणना का कार्य एवं सर्वे प्रशिक्षण में बीएलओ शिक्षकों को लगाया गया है। जान बूझकर शिक्षण व्यवस्था को सुधारने की बजाय प्रशासन खुद ही शिक्षण व्यवस्था को बिगाड़ने का कार्य कर रही है। बीएलओ शिक्षको को केवल चुनाव एवं निर्वाचन आयोग से संबंधित कार्य के लिए ही बाध्य है। शिक्षकों एवं बीएलओ को ओबीसी वर्ग के सर्वे कार्य से मुक्त रखा जाए। अन्य विभाग कर्मचारियों की छात्रहित में ड्यूटी लगाई जाये पूर्व में जनगणना के प्रथम चरण में सैकड़ों शिक्षको की ड्यूरी से शिक्षक व्यवस्था गड़बड़ा गई थी। पहले से ही राजकीय विद्यालयों में सैकड़ों की तादाद में समस्त संवर्गों के पद खाली है, ऊपर से राजनैतिक आधार पर तबादला सूची में शिक्षकों को प्रताड़ित कर दूरस्थ भेजा जा रहा है। गैर शैक्षणिक कार्यों मे शिक्षको एवं बीएलओ शिक्षको की ड्यूटी लगाने से शिक्षण व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है क्योकि जिस तरह से जनगणना में कई विभागों को छोड़कर मात्र शिक्षा विभाग के शिक्षक ही नजर आ रहे है। शासन व प्रशासन को इतना ध्यान होना चाहिए, जिन शिक्षकों के भरोसे अभिभावक बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाते है उनके भविष्य के साथ कुठाराघात हो रहा है। अगर शिक्षकों को ही गैर शैक्षणिक कार्यों में धकेल दिया जाये तो भावी कर्णधार का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा, साथ ही सरकारी स्कूलों की गुणवता भी जबरदस्त प्रभावित होगी। यह तो बात सत्य है, आज सरकारी स्कूलो में गरीब व मध्यम वर्ग वर्ग के छात्र-छात्रा अध्ययन करते है। काश सरकारी स्कूलों में भी राजनेताओं व अधिकारियो के बच्चे पढ़ते तो फिर शिक्षको से गैर शैक्ष‌णिक कार्या से राहत अवश्य मिल पाती, लेकिन वर्तमान में शासन व प्रशासन की भावी युवा पीढ़ी व नौजवानों की शिक्षण व्यवस्था व कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह खडे करता है। बच्चों की शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो तो प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता है लेकिन प्रशासन का काम शत-प्रतिशत सफल हो, यही सोच वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए घातक साबित हो रही है। लाखो बच्चों के अभि‌भावक सरकारी स्कूलों में अध्ययन इसलिए कराते हैं कि बच्चों का भविष्य सुधर सके। इसके विपरित गैर शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों एवं बीएलओ की ओबीसी सर्वे ड्यूटी से नया सत्र के आरम्भ में ही व्यवस्था प्रभावित होने की पूरी सम्भावना नजर आ रही है। आखिर शिक्षा विभाग व शिक्षको की सूद कौन लेगा जिससे शिक्षण व्यवस्था के साथ शिक्षा की गुणवता बढ़ सके। बार-बार बीएलओ शिक्षको को ओबीसी सर्वे जनगणना में लगाना कहा तक उचित है। देखा जाये तो प्रशासन ने राज्य भर में प्रत्येक सरकारी स्कूलों से चार व पाँच-पाँच शिक्षकों को बीएलओ बना रखा है जो बिल्कुल उचित नहीं है। अब केवल शिक्षा विभाग से ही 90 प्रतिशत शिक्षकों,वरिष्ठ अध्यापको,शारीरिक शिक्षको को बीएलओ बना रखा है। वर्षों से लगे बीएलओ जिनकी उम्र 55 या उससे अधिक वाले को तत्काल हटाया जाना चाहिए लेकिन प्रशासन नियम,कानून-कायदे ताक में रखकर में रखकर के शिक्षा विभाग के शिक्षकों को ही बीएलओ बनाकर टारगेट किया जाता है। जिससे शिक्षण व्यवस्था पटरी से उतरने के साथ ही आमजन का सरकारी स्कूलों के प्रति मोहभंग हो रहा है। आखिर सरकार व प्रशासन बच्चो की शिक्षण व्यवस्था पर कब सकारात्मक रूख अपनायेगी। यह बहुत बड़ा मुद्दा है। जिस दिन सरकार शिक्षको को गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करने का ऐलान करेगी तब ही राज्य की शिक्षण व्यवस्था सुधर सकती है। कब तक सरकार शिक्षको से बेगारी कार्य में धकेलती रहेगी यह बड़ा प्रश्न है।

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Author: a1khabarfast

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