वाडाखेड़ा कंजर्वेशन रिजर्व की अनदेखी पर पूर्व विधायक लोढ़ा नाराज, विकास कार्यों में तेजी लाने की मांग*  – वन्यजीव कॉरिडोर होने के बावजूद जनप्रतिनिधियों की नजरअंदाजी पर्यटन व रोजगार की संभावनाओं को कर रही धूमिल

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*शिवगंज।* सुंधामाता कंजर्वेशन रिजर्व, माउंट आबू सेंचुरी और जवाई कंजर्वेशन रिजर्व को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव कॉरिडोर के रूप में वर्ष 2022 में घोषित वाडाखेड़ा कंजर्वेशन रिजर्व आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। घोषणा के तीन वर्ष बाद भी अपेक्षित विकास कार्य धरातल पर नजर नहीं आने से वन्यजीव के साथ पर्यटन को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर पैदा करने की संभावनाएं धूमिल होती नजर आ रही है। गुरुवार को सिरोही के पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने वन विभाग के अधिकारियों व कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ क्षेत्र का दौरा कर कार्यों की धीमी प्रगति पर नाराजगी जताई और शीघ्र ठोस कार्रवाई की मांग की।

दौरे के दौरान सामने आया कि रिजर्व क्षेत्र में आंतरिक ट्रेक मार्ग तक विकसित नहीं किए गए हैं। कर्मचारियों को एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए हाईवे का जोखिमपूर्ण रास्ता अपनाना पड़ता है। पर्यटन गतिविधियों की शुरुआत के लिए भी कोई समुचित योजना दिखाई नहीं दी। लोढ़ा ने चारों दिशाओं में कच्चे ट्रेक मार्ग, साइन बोर्ड, सुरक्षा चौकियां और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने को अत्यावश्यक बताया, ताकि यह क्षेत्र इको-टूरिज्म का सशक्त केंद्र बन सके।

*जल संरक्षण और वन्यजीव सुविधा पर सवाल*

लोढ़ा ने बताया कि वन्यजीवों के लिए बनाए गए तालाब तकनीकी रूप से कमजोर पाए गए, जिनमें पानी टिक नहीं पाता। गर्मियों में जल संकट की स्थिति बन जाती है। उन्होंने विशेषज्ञों की सलाह से स्थाई जलाशय निर्माण, सोलर पंप सेट स्थापना तथा बरसाती नालों पर छोटे-छोटे एनीकट बनाकर जल संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग की ताकि जमीन में नमी बनी रहेगी और प्राकृतिक हरियाली को बढ़ावा मिलेगा।

*देशी प्रजातियों के संवर्धन की जरूरत*

क्षेत्र में फैले अंग्रेजी बबूल को जैव विविधता के लिए हानिकारक बताते हुए लोढ़ा ने इसे हटाकर खेजड़ी, नीम, सीरस, बेर, खैर, सहजन जैसे देशी पौधों का रोपण करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्कूलों, कॉलेजों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी से चरणबद्ध हरियाली अभियान चलाया जाए, ताकि यह क्षेत्र भविष्य में फलदार वृक्षों और पक्षियों की चहचहाहट से समृद्ध हो सके।

*वन नीति के लक्ष्यों से पीछे राजस्थान*

लोढ़ा ने कहा कि नेशनल फॉरेस्ट पॉलिसी 1988 एवं राजस्थान स्टेट फॉरेस्ट पॉलिसी 2010 के अनुसार कुल भूभाग का 33 प्रतिशत वनावरण होना चाहिए, जबकि राजस्थान में यह लगभग 10-11 प्रतिशत ही है और घना वन क्षेत्र 4 प्रतिशत से भी कम है। वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा 36 ए के तहत घोषित इस रिजर्व के लिए विगत वर्ष 10 वर्षीय प्रबंधन योजना तैयार हो चुकी हैं,मगर सरकार की ओर से धन उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा हैं।

*रोजगार और पर्यटन की अपार संभावनाएं*

लोढ़ा ने बताया कि 4331 हेक्टेयर में फैले इस क्षेत्र में हिरणों की संख्या 20 से बढ़कर 150 के आसपास पहुंच चुकी है। भालू, पैंथर, सियार सहित अनेक वन्यजीव यहां विचरण कर रहे हैं। यदि सरकार ठोस योजना के साथ विकास कार्य तेज करे तो यह रिजर्व वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन, होटल, गाइड, परिवहन व अन्य सेवाओं के माध्यम से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा केंद्र बन सकता है।

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Author: a1khabarfast

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